वक्त गुजरते गुजरते.... 

फिर एक साल निकल गया.... 

इतिहासकार की कलम को... 

एक और पन्ना मिल गया


कितना सिखा... कितना सिखाया

बुलंदीयों कि चाह में... 

कितना समय बिताया... 


जाने खुश क्यों हो... इसके जाने से

माना बुरा था ये साल... कुछ 

अनचाही

अनदेखी

अनसुनी... मुसीबतें जरूर देख ली

पर जिंदगी कितनी गर्म हो सकती है... 

उसकी गर्माहट हमने छांव से ही सेख ली


सिखा भी तो होगा ना इससे... 

जी सकते हैं उनके बिना भी... 

एक पल भी दूर नहीं रहा जा सकता था जिससे



सब बंद था... 

दिल तो मिल रहे थे... 

दादी पोते दोनों एक साथ थे... 

कहीं नाना के हाथ में नातिन के हाथ थे... 


माना मुसिबतों की खान था यह साल

पर जिंदा रहे हम इसमें भी देंगे हर पीढ़ी को इसकी मिशाल