मुद्दतों बाद मिले, घंटों चला किस्सा यारी का।

लाचारी झाँकती रही उसके ठहाकों की ओट में।

मैं समझदार था, इंतज़ार किया उसके कहने का।

वो यार था, छिपा गया सब ख़ुद्दारी की ओट में।।

रूठ जाती थी नींदें अल्लहड़पन के दौर में,

जो गलती से कभी तकिया बदल लेते थे हम।

ढूँढती चली आती हैं अब नींदें नंगे पाँव मुझको,

कभी थक के जो कहीं सिर टिका लेते हैं हम।।

साथ है अगर तू जो उम्र भर के लिये,

तो फिर मुझे आईने की ज़रूरत क्या है।

जैसा भी हूँ दिख जाता हूँ आँखों में तेरी,

किसी और के मशवरे की ज़रूरत क्या है।।

खाख से आये हो या अफ़रात से,

ये महज़ एक इत्तिफ़ाक़ होता है।

गर्त के रहगुज़र पे हो या शिखर के,

ये वरण ही बस तेरा अंजाम होता है।।

आसमाँ को छूती इमारतों का जंगल है,

बारिशों में शहर अपना मौसमी समंदर है।

क्या खूब इंसानी तरक्की का नायाब नज़ारा है,

आँख बंज़र, दिल पत्थर और हर कोई सिकंदर है।।

उड़ान हो ऐसी की, बादलों से पहचान करा दे।

शख्शियत हो ऐसी की, नज़रों से ही काम करा दे।।

ख़ुदा न हो जाओ कहीं, दिल में ये डर रखना।

बुलंदियों तक जाओगे फिर, ये यकीन रखना।।

मैं जीता रहा परिंदों सा उम्र भर,

अक्सर आशियाने बदलता रहा।

क्षितिज को पाने की मरीचिका में,

न ज़मीं मिली न अपना आसमाँ ही रहा।।

-अजीत