मिन्नतें की थी कई बार मैंने, सिरे से तूने खारिज़ कर दिया।आज समझा मैं गलत था, हक़ में मेरे फैसला कर दिया।।
कदम थक गये तो, अल्पकालिक पड़ाव समझो।
सब्र टूट जाये तो, मंजिल को आस-पास समझो।।
घर बन के बसा कई बार, मकां बन के मैं फिर बिक गया।
सबकी हँसरतों और हादसों का, चश्मदीद बनके रह गया।।
एक तीली जली, हवाओं ने मिल के घेर लिया।
हथेलियों ने ओट दी और मशाल जला लिया।।
परखने का बदलने का, इतना भी नशा न कर।
वो जैसा भी है जी लेगा, खुद को तू खर्च न कर।।
परिभाषित रिश्तों की किताब में, ज़िक्र तेरा मिलता नहीं।हृदयस्पर्शी हो इसलिए शायद, तुम जैसा कोई दिखता नहीं।।
वक़्त की पाबन्दियों के दायरे में रहकर न तुम मिला करो।एहसासों की अभिव्यक्ति में वक़्त लगता है, समझा करो।।
कुछ और नहीं, वो बस सुरक्षा का कवच ओढ़ती है।
दुर्घटनाओं के चक्रव्यूह को, सावधानी ही तोड़ती है।।
नफ़रत न कर, उसकी गिरफ्त में आ जाएगा।
अपनी खुशियों समेत तू पूरा ज़ब्त हो जाएगा।।
आईने की जुस्तजू भी है, कुछ छिपाना भी चाहते हो।
छोटी सी ज़िन्दगी में, अंतर्द्वंद इतना क्यों पालते हो।।
#अजीत


