
कौन है ये,दरख़्तों के झुरमुट से,यूँ झाँक रहा है,
हो निर्निमेष,अपलक, मुझे यूँ ताक रहा है।
कौन है जो, छद्मवेश में ,श्वेत रोशनी बाँट रहा है,
हो कृपाण,घोर निशा को, अनवरत यूँ काट रहा है।
क्यों अन्तर्मन को ,ये मेरे ,यूँ सहला रहा हैं,
हकीकत है ये,या यूँ ही ,मुझे बहला रहा है,
क्यों मन की बातें सारी,ये जुबां पर ला रहा है
हो अमृत, रजत बूंदों की वृष्टि से ,मुझे नहला रहा है
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