कौन है ये,दरख़्तों के झुरमुट से,यूँ झाँक रहा है, हो निर्निमेष,अपलक, मुझे यूँ ताक रहा है। कौन है जो, छद्मवेश में ,श्वेत रोशनी बाँट रहा है, हो कृपाण,घोर निशा को, अनवरत यूँ काट रहा है। क्यों अन्तर्मन को ,ये मेरे ,यूँ सहला रहा हैं, हकीकत है ये,या यूँ ही ,मुझे बहला रहा है, क्यों मन की बातें सारी,ये जुबां पर ला रहा है हो अमृत, रजत बूंदों की वृष्टि से ,मुझे नहला रहा है। क्या निहारते तुझे यूँ, जिजीविषा लौट आई है? हृदय हुआ परिवर्तित, या केवल मन की अँगड़ाई है? क्या अन्तर्मरुभूमि में मेरे ,फिर कोंपले फूट आई हैं, क्षणिक हवा का झौका हैं,या मद्धम पुरवाई है। पर चाहे जो हो , दिव्य विभा का अनुपम ये कोर हैं, चहुँ दिश पसरी निस्तब्दता में ,प्रमोदित शोर है, तूफ़ान में भटकी कश्ती के लिए ,एक छोर हैं जीवन के असीम क्षितिज में ,एक नई भोर हैं।