कुल सत्ताईस रूमाल मिले हैं
बरसों से जोड़ जोड़ कर रखे होंगे,
रूमालों के गाँठों मे जाने कबसे,
बाँधे कितने सिक्के होंगे |
एक जोड़ी मुरकी है, दादा की एक मात्र निशानी,
भ्रम है सबको शायद हैं सोने की ,
कुछ जेवर हैं नाम मात्र के ,
जो औपचारिकता पूरी करते हैं होने की |
कुछ साड़ियाँ है जो जाने किस किस ने,
कब कब किस किस मौके पर दी होगी ,
और तुमने खोले बिन ही बक्से मे
जस की तस रख दी होंगी |
बिखेर दी है देखो हमने वो दुनिया,
जीवन भर तिल तिल कर तुमने अफ़सोस समेटी ,
एक एक कर गाँठें सारी खुलती जाती,
एक एक बंधन से तुमको मुक्ति देती |
