आज विरासत देख रहे हैं, क्या छोड़ा तुमने, सारा जीवन रगड़ रगड़ कर , क्या जोड़ा तुमने | तुमने सारा जीवन कितनी बाँधी गिरहें , चुन चुन कर सारी खोल रहे हैं, और तुम्हारी चीज़ो का मोल है क्या, हम सब तोल रहे हैं |
कुल सत्ताईस रूमाल मिले हैं बरसों से जोड़ जोड़ कर रखे होंगे, रूमालों के गाँठों मे जाने कबसे, बाँधे कितने सिक्के होंगे | एक जोड़ी मुरकी है, दादा की एक मात्र निशानी, भ्रम है सबको शायद हैं सोने की , कुछ जेवर हैं नाम मात्र के , जो औपचारिकता पूरी करते हैं होने की | कुछ साड़ियाँ है जो जाने किस किस ने, कब कब किस किस मौके पर दी होगी , और तुमने खोले बिन ही बक्से मे जस की तस रख दी होंगी | बिखेर दी है देखो हमने वो दुनिया, जीवन भर तिल तिल कर तुमने अफ़सोस समेटी , एक एक कर गाँठें सारी खुलती जाती, एक एक बंधन से तुमको मुक्ति देती |