1.

जाग उठें श्री राम ह्रदय में,

कैसा दृश्य विहंगम हो ।

राम नाम का हो आराधन

राम धुनि की सरगम हो ।।

पुनः जगें श्रीराम, समर हो,

नाश अधम का उत्तर हो

पुनः धर्म की हो स्थापना,

नव संस्कृति तब उद्गम हो ।

2.

जागृत हों श्रीराम, अगर हो

बाण धनुष लेकर अपना

पुनः करें राज्य स्थापित,

अयोध्या में सुर संगम हो ।

मन के नयन खोल कर देखो,

जय श्रीराम बोल कर देखो ।

हर प्राणी में राम बसे हैं,

दर्शन किस रूप में उत्तम हो ।

3.

मन में श्रद्धा भी विशेष हो

मर्यादा कण-मात्र शेष हो,

संकीर्ण पटल ज्यों खुलें हृदय के,

सुख दुःख में दृष्टि तब सम हो ।

कहाँ ढ़ूढ़ते राम छवि को,

देखो हृदय का दर्पण हो ।

देख न पाते तेज़ राम का,

दृष्टि कितनी मद्धम, हो ?

4.

जो दे सबको शरण आसरा,

जो सबको दाना पानी दे,

जन्मभूमि पर आज स्वयं की,

बैठे छत बिन पुरषोत्तम हो ।।

वह टेंट नहीं है शूल गडा है,

अयोध्या की धरती पर,

छोटी सी छत दे न पाया,

मानव कितना निर्मम हो ||