उसूलों के वास्ते
अजय अमिताभ सुमन
हालात जमाने की कुछ वक्त की नजाकत,
कैसे कैसे बहाने भूलों के वास्ते।
अपनों के वास्ते कभी सपनो के वास्ते,
बदलते रहे अपने उसूलों के रास्ते।
कि देख के जुनून हम वतनों की आज,
जो चमन को उजाड़े फूलों के वास्ते।
करते थे कल तक जो बातें अमन की,
निकल पड़े है सारे शूलों के रास्ते।
खाक छानता हूँ मैं अजनबी सा शहर में,
क्या मिला खुदा तेरी धूलों के वास्ते।
दिल का पथिक है अकेला"अमिताभ" आज,
नाहक हीं चल पड़ा है रसूलों के रास्ते।