दुनिया ये तेरी मेरी , फरक फकत कि यूँ  हैI ना आरजू हुनुज है , ना कोई जुस्तजू हैII दियारे खुप्तागा माफिक, है मंजर कायनात केI ताउन से भी मुश्किल तबियत हालत केII ना बहती हर सहर , मर्सत बयार सी I शामें है शामें हिज्र ,रातें सबे फिराक कीII ऐ खुदा तू  ही जाने , ये उकदायहोक कायनातI यहां ईब्लिश गालिब, वहाँ काफिरों की जामतII सजदे तो मैं भी रखता तेरी रहगुजर में ऐ मबुद। कि तल्खी ऐ जिस्त से , दिल भारी दिमाग उब II अब चलो चलें पूरा करने , अपने अपने शौकI तू पैदा कर नसले आदम मैं मुकर्रर अपनी मौतII