जीव तुझमें और जगत में, है फरक किस बात  की,

ज्यों थोड़ा सा फर्क शामिल,मेघ और  बरसात  की।


वाटिका  विस्तार  सारा , फूल  में  बिखरा हुआ,

त्यों  वीणा  का सार सारा, राग में  निखरा हुआ।


चाँदनी  है क्या असल  में , चाँद का  प्रतिबिंब है,

जीव  की  वैसी  प्रतीति , गर्भ  धारित  डिम्ब है।


या  रहो  तुम  धुल बन कर ,कालिमा कढ़ते रहो,

या  जलो तुम  मोम बनकर , धवलिमा गढ़ते  रहो।


पर  परिक्षण में लगो  या, स्वयम  के उत्थान में,

या निरिक्षण निज का हो चित ,रत रहे निज त्राण में।


माँग तेरी क्या परम से , या  कि दिन की ,रात की,

जीव तुझमें और जगत में,बस फरक इस बात की।