अपनी नयनों के पट खोल, झब्बर बकरा बोले बोल। खुल गयी डेमोक्रेसी की पोल, कि धूर्त नेता जनता बकलोल। डेमोक्रसी की यही पहचान,जाने जनता यही है ज्ञान। कि कहीं थूक सकती है वो,कि कहीं मूत सकती है वो। जनता की परिभाषा गोल,झब्बर बकरा बोले बोल। सर नापे सर मापे नेता,जनता के सर जापे नेता। ज्ञानी मानी व नत्थू खेरा,सबको एक ही माने नेता। नम्बर का हीं यहाँ है मोल ,झब्बर बकरा बोले बोल। पढ़ते बच्चे बनते नौकर,गुंडे राज करते सर चढ़ कर। राजा चौपट ,नगरी अन्धी,न्याय की बात तो है गुड़ गोबर। सारा सिस्टम है ढकलोल,झब्बर बकरा बोले बोल। ज्ञान का नहीं है कोई मान,ताकत का है बस सम्मान। जनता लुटे , नेता चुसे, बची नहीं है इनकी जान। कोई तो अब पोल दे खोल, झब्बर बकरा बोले बोल।