रक्त से लथपथ शैल गात व शोणित सिंचित काया,

कुरुक्षेत्र की धरती पर लेटा एक नर  मुरझाया।

तन पे चोट लगी थी उसकी जंघा टूट पड़ी थी त्यूं ,

जैसे मृदु माटी की मटकी हो कोई फूट पड़ी थी ज्यूं।


भाग्य सबल जब मानव का कैसे करतब दिखलाता है ,

किचित जब दुर्भाग्य प्रबल तब क्या नर को हो जाता है।

कौन जानता था जिसकी आज्ञा से शस्त्र उठाते थे ,

जब वो चाहे भीष्म द्रोण तरकस से वाण चलाते थे ।


सकल क्षेत्र ये भारत का जिसकी क़दमों में रहता था ,

भानुमति का मात्र सहारा सौ भ्राता संग फलता था ।

जरासंध सहचर जिसका औ कर्ण मित्र हितकारी था ,

शकुनि मामा कूटनीति का चतुर चपल खिलाड़ी था।


जो अंधे पिता धृतराष्ट्र का किंचित एक सहारा था,

माता के उर में बसता नयनों का एक सितारा था।

इधर उधर हो जाता था जिसके कहने पर सिंहासन ,

जिसकी आज्ञा से लड़ने को आतुर रहतादु:शासन।


गज जब भी चलता है वन में शक्ति अक्षय लेकर के तन में,

तब जो पौधे पड़ते पग में धूल धूसरित होते क्षण में।

अहंकार की चर्बी जब आंखों पे फलित हो जाती है,

तब विवेक मर जाता है औ बुद्धि हरित हो जाती है।


क्या धर्म है क्या न्याय है सही गलत का ज्ञान नहीं,

जो चाहे वो करता था क्या नीतियुक्त था भान नहीं।

ताकत के मद में पागल था वो दुर्योधन मतवाला,

ज्ञात नहीं था दुर्योधन को वो पीता विष का प्याला।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित