जहां चिमनियों से उठ रहा
धुंआ बनकर मजदूरों के खून नित
वहां मानवता की बात करना बेमानी है।
जहां गेहूं-सा पीस रहा
हर आदमी नित
वहां विकास की बात करना बेमानी है।
जहां खेतों व सड़कों पर मर रहा
भूखे पेट किसान और मजदूर नित
वहां आत्मनिर्भर बनने की बात करना बेमानी है।
जहां समाज में धार्मिक-विद्वेष फैलाया जा रहा
राजनेता और मीडिया द्वारा नित
वहां धर्म की बात करना बेमानी है।
जहां विश्वविद्यालयों में पीटा जा रहा
देश के भावी कर्णधार नित
वहां विश्वगुरु बनने की बात करना बेमानी है।
जहां जेलों में डाला जा रहा
सच्चाई को उठाने वाले पत्रकार व बुद्धिजीवियों को नित
वहां आजादी की बात करना बेमानी है।
जहां मां, बहन और बेटियों के साथ बलात्कार हो रहा
सत्ता में बैठे राजनेताओं द्वारा नित
वहां 'बेटी पढ़ाओ,बेटी बचाओ' की बात करना बेमानी है।


