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देश की दशा

जहां चिमनियों से उठ रहा 

धुंआ बनकर मजदूरों के खून नित

वहां मानवता की बात करना बेमानी है।


जहां गेहूं-सा पीस रहा

हर आदमी नित

वहां विकास की बात करना बेमानी है।


जहां खेतों व सड़कों पर मर रहा

भूखे पेट किसान और मजदूर नित

वहां आत्मनिर्भर बनने की बात करना बेमानी है।


जहां समाज में धार्मिक-विद्वेष फैलाया जा रहा

राजनेता और मीडिया द्वारा नित

वहां धर्म की बात क

Tag: मजदूर और9 अन्य
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