
जहां चिमनियों से उठ रहा
धुंआ बनकर मजदूरों के खून नित
वहां मानवता की बात करना बेमानी है।
जहां गेहूं-सा पीस रहा
हर आदमी नित
वहां विकास की बात करना बेमानी है।
जहां खेतों व सड़कों पर मर रहा
भूखे पेट किसान और मजदूर नित
वहां आत्मनिर्भर बनने की बात करना बेमानी है।
जहां समाज में धार्मिक-विद्वेष फैलाया जा रहा
राजनेता और मीडिया द्वारा नित
वहां धर्म की बात क
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