हम शहरातियों को
कहां पता अन्नदाताओं की हकीकतें
उनकी दम तोड़ती
धूमिल हो चुकी ख्वाहिशें
खेतों में खुले आसमां के नीचे
जेठ की तपती धूप में
पूस की रात के घने अंधेरे में
भादों के मूसलाधार बारिश में
धूप हो या बरसात हो
सर्दी हो या गर्मी हो
वो उठायें रहते हैं सदा
125 करोड़ भारतीयों के बोझ
फ़िकर करते हैं वो
लोगों के भूखे पेट की
पर सदैव उपेक्षित रहा है वो
हमने उनका शोषण किया
और आज भी करते हैं
हम उनका शोषण
राजनीति चमकाते बस अपनी
इनकी लाशों पर
आखिर कब तक
हम यूं ही करते रहेंगें
गंदी राजनीति
इनके लाशों पर।


