वो पहर है, वो लहर है

वो है निर्जल धारा जल की

आने से उसके जिदंगी में हुआ उजाला है

मन को बहुत लुभाता है

ठुड्डी पर वो जो तिल़ काला है


वो हवाओं सी मधम मधम् बहती है

इठराती है शरमाती है

गहरे शान्त अनंत सागर में वही बस वही नज़र आती है

पर देखो जितनी दफा 

हर बार एक नये रुप में उभर कर आती है


निगाहें उसकी खुला मैख़ाना हैं

मैं कहता हूँ दरबा़न बैठा लो

थोड़ा सा बस थोड़ा सा तुम काज़ल लगा लो 

उसके कंधे पर रखा वो दुप्पटा

मैं कहता हूँ मुझको करीब बुला लो

थोड़ा सा बस थोड़ा सा तुम जुल्फें बिखरा लो


कानों में उसके खनकती बाली

मैं कहता हूँ माथे पर बिंदिया भी चमकने दो

ये एहसास मोहब्बत का यों ही पनपनें दो


वो पहर है, वो लहर है

वो है निर्जल धारा जल की

- Ajay Poonia