एक रोटी की भुख, दो परोसा करती थी
दो आन्ने थी स्कुल जाने की रिश्वत, वो छुप कर पांच का सिक्का देती थी
सजा संवारकर, कानों के पीछे वो लगा काली टिक्की बाहिर भेजे
लौट न आऊं जब तक वो अखियां रस्ता देखे
पुरा गांव वो छान मारती थी ज़रा सी देर जो हो जाए घर आने में
मां सा कोई नहीं है इस जमाने में।।
अहसासों की थी वो अजब पिटारी
उसके नुक्से सब हकीमों पर भारी
अरमानों का एक सागर थी
दर्द हंसी की, सुख-दुख में
वो नम्र मुलायम चादर थी
प्यार की तुरपाई की, सब रिश्ते फटे पुराने में
कोई कसर नहीं छोड़ी उसने उन दिवारों को घर बनाने में
मां सा कोई नहीं है इस जमाने में।।
वो बाजार के मनभावन मंहगे खिलौने
लुंगा मैं भी जिद से जब लगता था रोने
वो Parle G एक पैकेट से मुझको बहला देती थी
सब दर्द अकेले सहती, पुछो तो "अच्छी हूं" बतला देती थी
जिसने अपना सब दुसरों पर वारा हो, उस को क्या दूं मैं नज़रानें में
मां तेरे जैसा है ही नहीं कोई इस जमाने में।।


