तुम चाय बनाना,

मैं ईश्क पी लुंगा।

तुम उसको रख कुल्हड़ में देना

मैं अधरों से मेरे, जैसे चुम्मु होंठ तुम्हारे

उस मिट्टी की खुशबू लुंगा।।।


वो उबलती, कुलबुलाती चाय

जैसे बैठी तुम, बिस्तर सजाये।

बस अपने नैनों का नशा उसमें भर देना

उसी चाय की प्याली को मेंरी मधुशाला कर देना।।

मैं पल में पी लुंगा, पल में झुम भी लुंगा

गम़ हो या खुशियां, अकेले में हो या भीड़

मैं सब बातें उस चाय की चुस्की में बोल भी दुंगा।।


जब चुम वो मेरे होंठों को

अमृत सी गले से उतर जाएगी,

उस पल में आनंद बहुत दिलायेगी।।

मोक्ष प्राप्ति हो नजरों में

चाय की प्याली से ईश्क अब वो पिलायेगी।।।


तुम चाय बनाना,

मैं ईश्क पी लुंगा।

हर इक चुस्की में तुम्हारे करीब हो लुंगा

तुम बस चाय बना लेना।।।