हरे-भरे थे जब
तो सींचते रहे
पत्तियों और फूलों को,
जुड़ी रही शाखाएँ और
टहनियाँ भी
बसाये थे आसियाने
परिंदों ने भी उनपर।
अब खड़े हैं
शहर के बीचों-बीच
बेसहारा
दो ठूँठ।
बीतते पतझड़ों के साथ
अलग होती रही
पत्तियाँ धीरे-धीरे,
बढ़ती उम्र के संग
टूटती गई शाखाएँ
और टहनियाँ।
छोड़ गए अब
परिंदे भी उन्हें
क्योंकि नहीं आते
उनके काम
नहीं दे पाते
छाया और बसेरा।
एक-एक कर
सबने छोड़ दिया है उन्हें
लावारिस
सुखने के लिए।

