धुंध


हुए हैं हम

मोतियाबिंद के शिकार

या लगा है आँखों पर

रुआब का पर्दा,


बढ़ रही है शहर की

आबोहवा में धूल,

या जम रही है

रिश्तों पर गर्द,

साफ कुछ नजर नहीं आता।


छाया है

सर्द मौसम का कुहरा,

या अपनेपन की गरमाहट

हुई है कम,

कुछ कहा नहीं जाता।


शहर से गाँव के

फासले बढ़े हैं

या रिश्तों के बीच

बढ़ी है गर्तें,

दोनों में ही जमी हुई है

धूल की कुछ पर्तें,


कमी अपनेपन की अब

खलने लगी है,

शहर हो या रिश्तें

धुंध बढ़ने लगी है।