क्या कहूँ?
मैं किस कदर टूटा हूँ, देखकर
जिंदा जलती चिताएँ बेजुबानों की,
जली हुई लकड़ियाँ परिंदों के आसियानों की,
हरे-हरे पत्तों के काले पड़ जाने से,
लहराती हुए टहनियों के चटक जाने से,
स्वाभिमान से खड़े तनों के झुलस जाने से,
हरे-भरे मधुवन में
दावानल के लग जाने से।
क्या कहूँ?
मैं किस कदर टूटा हूँ, देखकर
बे-घर भटक रहे बेजुबानों को,
खाने को तरस रहे चौपायों को,
परिंदों के बसेरे लूट जाने से,
सभी के बे-घर हो जाने से,
जंगल के शमशान बन जाने से,
हरे-भरे मधुवन में
दावानल के लग जाने से।
क्या ये कोई साज़िश थी इन्सानों की
या प्रकृति ने खेल खेला है?
क्यों वीरान पड़ा है जंगल
होना क्या मानवों का बसेरा है?
साँसें जो देते थे हमें
वो खड़े है निर्जीव से,
भरेगी क्या वो कमी कभी
ऋतुराज के भी आने से,
हुई है जो क्षति मधुवन में
इस आग के लग जाने से?


