लहू बेच कर मंडप सजाया है
बारातियों को खाने में मजा नहीं आया है

एक मां ने अपने जिगर का टुकड़ा देदिया
लोग पूछते हैं गाड़ी में क्या लाया है

भाई की बहना, छोटी बहन का गहना सब देदिया
समाज की नजर में बस दहेज ही आया है

अपनी बेटी के लिए घर जैसा ससुराल देखते हैं
और बेटे के समय हिसाब लाया हैं

सोच समझ कर किसी ने रिवाज बनाया है
बहु को बेटी कह तो दिया, समझ नही पाया है

शादी के बाद परिवार का दिल बहु होती है
एक पिता बेटी के लिए हर खुशी खरीद लाया है

सारा दिन खपा दिया घर के काम में
मेहनत उसकी दिखी नहीं, 
एक नादानी पर बहु का बाप बुलाया है

पूर्ण समर्पित होने पर भी ताने सुनती है
एक बहु, थाली से कंकर और दाने चुनती है



लेखक:- अजय किशोर
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