
हर कदम पर जालिम बैठे है,
यहां संभाल कर चलना पड़ता है,
देते चोट सभी है पर
सामने हसना पड़ता है
शब्दों के बांडों से घायल जब हो जाते है,
यकीन मानो तीर चलाने वाले के आगे हसकर मिलना पड़ता है।
हर कदम पर जालिम बैठे है,
यहां संभाल कर चलना पड़ता है,
जो सेहता चोट हँसकर,
हर दुख उसी को सहना पड़ता है,
फसा है गर्दिश की लहरों में जो,
समुद्र जीवन का उसी को पार करना पड़ता है,
हर कदम पर जालिम बैठे है,
यहां संभाल कर चलना पड़ता है,
होता साथी जो है अपना लाभ वही उठता है,
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