हर कदम पर जालिम बैठे है,
यहां संभाल कर चलना पड़ता है,
देते चोट सभी है पर
सामने हसना पड़ता है
शब्दों के बांडों से घायल जब हो जाते है,
यकीन मानो तीर चलाने वाले के आगे हसकर मिलना पड़ता है।
हर कदम पर जालिम बैठे है,
यहां संभाल कर चलना पड़ता है,
जो सेहता चोट हँसकर,
हर दुख उसी को सहना पड़ता है,
फसा है गर्दिश की लहरों में जो,
समुद्र जीवन का उसी को पार करना पड़ता है,
हर कदम पर जालिम बैठे है,
यहां संभाल कर चलना पड़ता है,
होता साथी जो है अपना लाभ वही उठता है,
भाई-भाई कहकर देखो काम सभी बनाता है,
हर कदम पर जालिम बैठे है,
यहां संभाल कर चलना पड़ता है,
जो कोई पूछे हाल तुम्हारा,
हंस कर टालना पड़ता है,
चलते-चलते कोई उलझे,
बचके निकलना पड़ता है
हर कदम पर जालिम बैठे है,
यहां संभाल कर चलना पड़ता है,
अपना हो या हो कोई पराया,
धीरे ही बोलना पड़ता है।
क्या पता कोन चलादे खंजर छुपके,
अपनी पीठ, अपना पेट बचाकर चलना पड़ता है।
हर कदम पर जालिम बैठे है,
यहां संभाल कर चलना पड़ता है,


