यम लोक के द्वार छूकर आई है
बस मुझे जियाने के खातिर 
सौ बार मर कर भी मां मुस्काई है

माँ जो बूढी हो जाती है।
झुरियों में सपने खो देती है।
देख सफल बच्चों को फिर मां मुस्काती है।

सारी उमर सहती दुख है।
कभी पिता की, कभी पति की ।
कभी बच्चों की कहती है।

अपना जीवन भूल गई।
मां बस बच्चों के लिए जिंदा रहती है।

लेखक:- अजय किशोर
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