शब्दों की भीड़ में जज़्बातों का मेला है
आधुनिक दौर में हर इंसान अकेला है
पैसों की गर्मी से मुर्दों में जान है
बदलते ज़माने की देखो यही पहचान है
शब्दों की भीड़ में जज़्बातों का मेला है
करता है मेहनत जो दुखों ने उसी को घेरा है
गरीबों का यही तो जीवन मेला है
ग़रीबों के शब्दों से कम जज़्बातों से खेल है
इसी लिए हर गरीब आज भी अकेला है
शब्दों की भीड़ में जज़्बातों का मेला है
