भविष्य के लिए वर्तमान हम खोते रहे। कुछ बनने की चाह में सारी उम्र रोते रहे। आवाज़ न सुनी किसी ने रोने की ओर हम अपना बचपन खोते रहे।
अरमानों का बोझ हम बस ढोते रहे। किसी ने ना पूछा चाहते क्या हो। बस ख्वाहिशें वो सुनाते रहे। कब हुए बड़े पता ये चला नहीं। बचपन गया कब निकल अहसास ये हुआ नहीं। रह गए हम अकेले जीवन के सफर में जान कर सब अब हम मुस्कुराते नहीं।
भविष्य के लिए वर्तमान हम खोते रहे। कुछ बनने की चाह में सारी उम्र रोते रहे। आवाज़ न सुनी किसी ने रोने की ओर हम अपना बचपन खोते रहे।
दोस्त सारे बिछड़ गए। अपने सारे बिखर गए। कुछ बनने की चाह में ये हम कहाँ निकल गए। दर्द अपना बता सकते नहीं। ज़ख़्म ये दिखा सकते नहीं। नासूर बन गए हैं ज़ख़्म जो हम उन्हें मिटा सकते नहीं। खड़े हम आज भी वहीं हैं। दोस्त हमारा अब कोई नहीं हैं।
भविष्य के लिए वर्तमान हम खोते रहे। कुछ बनने की चाह में सारी उम्र रोते रहे। आवाज़ न सुनी किसी ने रोने की ओर हम अपना बचपन खोते रहे।
चाहते हैं हमभी कुछ करना। माँ, बाबा की झोली खुशियों से भरना। हर मोड़ पर हैं लोग खड़े। चहरे पर मुस्कान ओर हाथों में खंज़र लिए। दुश्मन हैं कोन अपना ये जाता सकते नहीं। दोहरी जीवन प्रणाली को अब हम मिटा सकते नहीं।
भविष्य के लिए वर्तमान हम खोते रहे। कुछ बनने की चाह में सारी उम्र रोते रहे। आवाज़ न सुनी किसी ने रोने की ओर हम अपना बचपन खोते रहे।
(अजय किशोर) Mob.9999191546


