
भविष्य के लिए वर्तमान हम खोते रहे। कुछ बनने की चाह में सारी उम्र रोते रहे। आवाज़ न सुनी किसी ने रोने की ओर हम अपना बचपन खोते रहे।
अरमानों का बोझ हम बस ढोते रहे। किसी ने ना पूछा चाहते क्या हो। बस ख्वाहिशें वो सुनाते रहे। कब हुए बड़े पता ये चला नहीं। बचपन गया कब निकल अहसास ये हुआ नहीं। रह गए हम अकेले जीवन के सफर में जान कर सब अब हम मुस्कुराते नहीं।
भविष्य के लिए वर्तमान हम खोते रहे। कुछ बनने की चाह में सारी उम्र रोते रहे। आवाज़ न सुनी किसी ने रोने की ओर हम अपना बचपन खोते रहे।
दोस्त सारे बिछड़ गए। अपने सारे बिखर गए। कुछ बनने की चाह में ये हम कहाँ निकल गए। दर्द अपना बता सकते नहीं। ज़ख़्म ये दिखा सकते नहीं। नासूर बन ग
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