अपने विकास को चलो, आज नया आधार दे
प्रचार में हम लिप्त हो, और मौन को आभार दें।
प्रकृति का दोहन कर, बुद्धि की तीक्ष्णता हरे
समरसता को नष्ट कर, विषमता की नींव धरें।
ढोंगियों का सम्मान कर, चाटूकारों का गुणगान करें
ईश्वर का नाम बेचकर, असत्य को अंगीकार करें।
अच्छा,यह कम पड़े, तो चलो ईमान बेच देते हैं
मानवता के भाव मर्म को,अब निर्वाण दे देते हैं।
इन महान कुकर्मों से, अंत को न्योता तो जाए
इस निश्छल धरा को हम से मुक्ति मिल जाए।
अजय झा **चन्द्रम्**

