एक उम्र के बादखुशियां ठहाकों कासाथ छोड़ देती हैंवो भी संजीदा होछोटी मुस्कुराहटों मेंतब्दील हो जाती हैंअल्हड़पन भूल करप्रौढ़ता की चादर मेंअकड़ सी जाती हैढूंढती है पुरानी यादेंऔर थक हार करअकेली मौन रह जाती हैं।अजय झा **चन्द्रम्**