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मिथ्या राज


मिथ्या के विसतृत प्रचार मेंअब सत्य दुराचार हैभ्रष्ट हमारे मनतन्त्र सखेक्या विचार क्या आचार है।

सब भाव श्रोत रुग्नऔर दुर्भावना परिपूर्ण हैउद्वेग और आक्रन्त सेबस अन्त हि सम्पूर्ण है।

अजय झा **चन्द्रम्**

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