जो ईश को भी पूज्य है,
प्रेम, त्याग में अतुल्य है
है सार भी विस्तार भी
भावों का हर उद्गार भी ।
अव्याख्य और अमूल्य भी
अनन्या है और अकाट्य भी
भले ओढ़े जग का भार पर
करती है पाप से उद्धार भी।
तेरे मेरे रोम रोम में है बसी
वो संस्कार का आधार भी
भले सवरुप उसका बदले
ममत्व रहेगा निर्विकार ही ।
अजय झा *चन्द्रम् *

