मै आश्वस्त हुं पूर्णतः, अब तुम कभी नही आओगे
मै निरस-निराश पड़ा रहूंगा, ओढ़े पतझर ठूंठ सा
हां कुछ एक लोग पुछेंगे, बातें भी बनेगी अतरंगी
कहानियां गढी जाएंगी, कुछ वाहियात और बेढंगी
तुम शायद ही जान पाओ, क्योंकि वहाँ वो शोर नही
वहाँ सुनते है सुनाते नही, भलमनसाहत की होड़ नही
पर नियति ने लिखी यही है, और चयन भी हमारा है
तुम शहर और मैं गाँव सा, न मैं गलत रहा न तुम सही
अजय झा **चन्द्रम्**

