मन बागी हो तन त्यागी हो
पर फिर भी कुछ खलता है
जग के स्वार्थ चलन को देख
कुछ अंदर ही अंदर जलता है ।


कभी क्रोध करे कभी रोष भरे
पर झुंझला कर भी क्या करे
काल और कर्म के बीच फसें 
किन किन बातो पे लड़े भीड़े।


अजय झा **चन्द्रम्**