हूँ नत्मस्तक तुम्हारे आगे
आज ये सब जानकर
भान मुझको हुआ खुद का
ये दिव्य रूप देखकर।
मौसमों के बदलते रंग तुमपे फब् रहे
बादलों से दुर् फिर पवन चुप कब् रहे।
ऐसा लगता है कि मानो
सब कुछ सिमटा है यहाँ
पंचतत्व कि गोद मे
मैं भी लिपटा हूँ यहाँ।
पंत जी के प्रकृति प्रेम का
बोध मुझको हो गया
इस मनोहर सत्य से
मेरा परिचय हो गया।
भाव मेरा भाग्य पर् इतरा रहा
स्वप्न तो नहीं इसलिए घबरा रहा।
देदिप्यमान सूर्य को नभ मे देख कर
देवत्व का आभास होता देव भूमि पर।
चाहे हो गंगा का पानी
या हिम कि बर्फिलि चोटियां
स्वयं महादेव रहते यहाँ
करते विविध अठखेलियां।
प्रकृति तुम्हारी प्रवृत्ति को मेरा प्रणाम है
जीवों कि पवित्रता में सर्वत्र् तेरा नाम है।
अजय झा **चन्द्रम्**


