तुम मेरे प्राण हृदय में, युहीं छुप करके रहना
बाहर है घना अंधेरा, अंतर से उजाला देना
मेरा मन तो है बैरी, कोई ज़ोर मेरा नहीं चलता
तुम चाहो तो इसे थामो, बस डोर बढाते रहना ।
मै बेगाना हो जाऊं, ये होगा कभी न मुझसे
तुमको अपना कह दे, इसमे बेबस हैं कबसे
मेरा चित यौवन सब, तुम बिन सुना ही रहेगा
हो वसंत या शीतलहर,युहीं जलता ही रहेगा ।
अजय झा **चन्द्रम्**

