सिफ़र से सिफ़र तक


सिफ़र से सिफ़र तक का सफ़र है यारों,

इबादत बिन हासिल क्या कर पाओगे,

फ़कत ये इख़्तेसार है जिंदगी का,

क्या ले कर आये थे क्या ले कर जाओगे ।।


लाख कर लो कोशिश हर हाल में,

रहमत बिन उसकी न हिल पाओगें,

हवाएँ तय करेगी मुक़द्दर दीये का,

फड़फड़ा के बुझोगें या जल जाओगे ।।


अज़ाब-बे-मालिक से कैसी पर्दगी,

आख़िरत में जा कर सब खुल जाओगे,

गुनाहों से गंदे हो सर से पैर तलक,

तौबा करो दिल से तो धुल जाओगे ।।


सिफ़र से सिफ़र तक का सफर है यारों,

इबादत बिन हासिल क्या कर पाओगे ।।

इख़्तेसार = सार (summary)


ऐजाज़ اعزاز