फ़ासला भी फ़ासले से फ़ासला रख रहा,
फ़ासला ज़माने का दस्तूर हो गया,
हर शख़्स मिल रहा अब फ़ासले के साथ,
जो था पहले दूर अब बहुत दूर हो गया।
ख़्याली फ़ासले क्या कम थे ज़माने में,
जो वबायीं फ़ासले का दौर आया,
बहाने हज़ार थे इख़्तिलाफ़ात थे कई,
अब मुँह ढक के चल देने का दौर आया ।
फ़ासलों से बेहतर कोई उस्ताद नहीं,
बहुतों की अहमियत सीखा देता है,
फ़ासलों से बदतर कोई चीज़ नहीं,
नाइत्तेफाक़ीयां बेवज़ह बढ़ा देता है।
दुनियां के लाख क़रीब तू रह ले,
दरमियां फ़ासला हमेशा रहता है,
हाक़िम को सज़दा कर इत्मीनान से,
खुदा और बंदे में फ़ासला नहीं रहता है।
वबायीं = महामारी के ( pandemic's)
इख़्तिलाफ़ात = अंतर/भेद (Differences)
नाइत्तेफाक़ीयां = फूट/दरार/नफ़रतें (Gap/Hatred)
ऐजाज़ اعزاز


