
फ़ासला भी फ़ासले से फ़ासला रख रहा,
फ़ासला ज़माने का दस्तूर हो गया,
हर शख़्स मिल रहा अब फ़ासले के साथ,
जो था पहले दूर अब बहुत दूर हो गया।
ख़्याली फ़ासले क्या कम थे ज़माने में,
जो वबायीं फ़ासले का दौर आया,
बहाने हज़ार थे इख़्तिलाफ़ात थे कई,
अब मुँह ढक के चल देने का दौर आया ।
फ़ासलों से बेहतर कोई उस्ताद नहीं,
बहुतों की अहमियत सीखा देता है,
फ़ासलों से बदतर कोई
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