हम महफ़ूज़ थे,
अपनी बेबुनियादी
तन्हाई के चार दीवारों में। 

 हम महफ़ूज़ थे 
अपनी बेबुनियादी
तन्हाई के चार दीवारों में। 
ना जाने किन लोगों ने दस्तक दे दी,
उसके दुर्दशाग्रस्त दरवाजे में। 

दरवाजा खुलते ही,
मिस्मार होने लगी दीवारे,
सब स्याही-स्याही रह गया।

वो तो चले गए 
हमे दिलासा दे कर,
ना वो ठहरे साथ मेरे,
ना उनके पीछे छूटी 
वो तन्हाई हमारी।

साथ छोड़ गए जर्जर माटी
पास हमारे,
हम धसते रहे उसी मे
कब्र बन गई वो हमारी।

ना मिली तन्हाई
ना साथ रहा मलाल।
अब बस खुदाई
और उसका मैं अब्दुल जलाल।।