तू सूख रहा हैं, 
तेरी हरियाली अब फीकी लग रहीं हैं।
सायद पानी रुख मोड़ रहीं हैं 
हिम्मत न हार,  
मैंने जकङ रखा हैं,
हालांकि रूखा मैं भी हो रहा हूँ ।

न पेङ आम का था न था बबूल का,
ए तो झुरमुट था 
खट्टे मीठे फलो का।

अब तो झुरमुट सूख रही है 
फल होंगे कहा से!
पानी धारा बदल रहीं हैं 
इसे सीचेंगे कैसे!

दोष सायद माटी की थी,
याराना निभा न पाया पानी संग
वर्ना नदियां तो अभी भी थल-थला रहीं हैं।
 
अब माटी में झुरमुट युही समा जाएगा 
अब ना बेर उगेंगे न कांटे ।
माटी भी बिखर जाएगी,
अपनी ज़र्जरता समेटते समेटते। 

पानी तू रुख न बदल,
खुशियाँ युही तो लायी थी तू 
अब आशा में निराशा ना ला।
तेरी छाया ताले उगने लगा था दोबारा 
अब तूही इसे यू ज़र्जर तन्हा, छोड़ ना जा।

उखड़ जाएगी हरियाली,
बिखर जाएगी माटी, 
धूल पैगाम बन जाएंगे 
एक हार याराने का।
तू रुख़ ना बदल अपना 
तू यूँ बेबस ना कर जा।
ए पानी तू साग हैं मेरा मुझे ऐसे ना सिसका ।