बादलों की गर्जना मैं, शांत नीर ठहराव हूँ, बहता हूँ तो वेग से मैं, निरंतर प्रवाह सामान हूँ.. हाँ हाँ मैं 'अज्ञात' हूँ।।   दामिनी का तेज हूँ मैं, जलधि का बिखराव हूँ, चांदनी की शीतल वृष्टि, मैं आदित्य का प्रकाश हूँ.. हाँ हाँ मैं 'अज्ञात' हूँ।।   अज़ान की आवाज़ भी हूँ, आरती की दीप्ति हूँ मैं, खुदा मुझमें, मैं हरि में सर्वथा, सर्वत्र विद्यमान हूँ.. हाँ हाँ मैं 'अज्ञात' हूँ।।   उर्दू मेरी, हिंदी मेरी, भारत माँ की संतान हूँ, हूँ पहले इंसान मैं तब, लेखनी का सिपाही मात्र हूँ.. हाँ हाँ मैं 'अज्ञात' हूँ।।   जान कर मुझे अंजान है जग, निज जन का सकल संसार हूँ, प्रस्तुत हूँ तो सूक्ति सा मैं, अन्यथा प्रश्न एक लाजवाब हूँ.. हाँ हाँ मैं 'अज्ञात' हूँ।।   दिया था नाम जाने ने अनजाने में, नूर भरी उजली वो खुशनुमा रात हूँ, मुस्कुरा दिया था मैंने भी जवाब में, बस तभी से मैं 'अज्ञात' हूँ।।।