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बहता पानी निर्मला

RaghavRaghav December 4, 2021
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बहता पानी निर्मला


थम जाने पर जैसे जल में काई जम जाती है वैसे ही ऐसा मन जो बदलाव और प्रगति से विमुख हो गया है, मलिन हो जाता है। आसक्ति, मोह और सुरक्षा की चाह के कारण मन बदलने से घबराता है। परंतु उसे यह नहीं पता होता कि यह सुरक्षा आत्मघातक है। 


हम दूसरों पर इतना आश्रित रहते हैं, इतना उन पर भरोसा रखते हैं। इतना अगर हम स्वयं के करीब हों तो हमारे बंधन कट जाएँगे। 


पराधीन सपन

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