है ख़्वाहिश मिरी ये पुकारो कभी तुम
सुनो तो! कहो भी! अरे तुम! अजी तुम!
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भटकता रहा मैं यहाँ वाँ हमैशा
मेरा दिल गया वाँ जहां भी गई तुम
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मयस्सर नहीं इक घड़ी चैन मुझको
मुझे याद आती रही हर घड़ी तुम
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किराया तो दो कुछ महब्बत का मुझको,
जो मुद्दत से मेरे ही दिल में रही तुम
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हुआ क्या है तुमको मुझे तुम कहो तो
जरा देर पहले थी अच्छी भली तुम
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जहाँ भी में जाऊँ तेरा साथ चाहूं
मुझे हो गई हर जगह लाज़मी तुम
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जो अव्वल नहीं ना सही मेरे हमदम
मगर हो मोहब्बत मेरी आख़री तुम
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