तेरे आने की आस कर रहे हैं

और ख़ुद को उदास कर रहे हैं

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हम तेरे इंतज़ार में कब से

जाने क्या क्या क़यास कर रहे हैं

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है सितम तेरे हो के भी ख़ुद को

हम सुपुर्द-ए-गिलास कर रहे हैं

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ख़ुश्क़ सेहरा में कुछ दिवाने लोग

यहां वां प्यास प्यास कर रहे हैं

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फिर यक़ीं कर रहे हैं सब उस पे

और ब-होश-ओ-हवास कर रहे हैं 

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सब मोहब्बत के नाम पर अफ़ज़ल 

रूह को बे लिबास कर रहे हैं

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