ज़ख़्म सीते हुवे मुस्कुराते हुवे
उम्र गुज़री है ज़ब्त आज़माते हुवे
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उसने रोका मुझे शहर से आते वक्त
मैं भी रोया बहत गांव जाते हुवे
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अक्स तेरा ही देखा है मैंने सनम
आज भी बाल अपने बनाते हुवे
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गांव आना कभी देखना तुम ज़रूर
तितलियों को वहां मुस्कुराते हुवे
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अश्क बहने लगे तेज़ धड़कन हुई
इक ग़ज़ल मीर की गनगुनाते हुवे
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शहर प्यारा है तुम को के तुम ने कभी
खेत देखे नहीं लहलहाते हुवे
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ग़ौर से देखिए आज के मुल्क को
ज़ुल्म सहते हुवे ज़ुल्म ढाते हुवे ----------------
बारहा हर जगह मुझ को झुकना पड़ा
हर दफ़ा ख़ुद को अफ़ज़ल बनाते हुवे
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