हमें वसीयत में खिलारा मिला है, जो हमारे पुरखों ने फैलाया जात-धर्म में कट्टरवाद के नाम पर। अब इस देशनुमा स्टोर में अटे पड़े इन तरह-तरह के ना-क़ाबिल-ए-इस्तेमाल असबाब का ज़िम्मा हमारे-आपके कँधों पर है। अब चाहे पुरातत्व की सील लगाकर इस खिलारे की मरहम पट्टी कीजे या रीसाइकल करके इसका रीयूज़ करें या फिर चुनाव के वक्त जज़्बात के चूल्हे में झोंकें या आवारा पशुओं की जुगाली का सामान बनने को छोड़ दें या बना लें किसी म्यूजियम की शान। क्योंकि दरात-कुदाली-पहिया-किताब यह बन नहीं सकता दरात-कुदाली-पहिया-किताब हमें वसीयत में मिले ही नहीं। हमें तो वसीयत में खिलारा मिला है।