इस सर्दी फिर जब कभी भी आईटीओ के किसी चौराहे पर या फिर सीपी के किसी ब्लाक के पीछे जलती अलाव देखता हूं तो भागता चला जाता हूं बैठ जाता हूं उन चौकीदार साथियों के साथ और शुरू हो जाती है गाम-देहात की बातें प्रवासी होने का दर्द एहि बेर गाम गेला बड्ड दिन भ' गेलै म्हारी मां की हालत ठीक कोन्या सुनते ही उठ जाता हूं खुद को दूर कर लेना चाहता हूं उस सच से जिसे कबूल नहीं सका अब तक घर आते आते पसीज जाता हूं उस सर्द अंधेरी रातों में जिसे आज तक अपना नहीं सका हूं