भावनाओं की उपजाऊ भूमि पर, कुछ शब्द गिरे इस आशा में;

एक नया फिर सृजन खिलेगा , गीत गजल की भाषा में ।। 


एक नया अंकुर फूटेगा , कुछ छंदों का आकार लिए;

फिर तरुवर वह प्रगति करेगा , कुछ अलंकारों से प्यार लिए ;

नव पुष्प खिलेंगे फिर उसपर , नौरसो से कुछ रसधार लिए ;

कुछ फल आएंगे अब उसपर, मातृत्व का सा प्यार लिए ।।


कुछ झंझावात भी आएंगे , कई दबाव उसे बहलाएंगे ;

किंतु भाषा का प्रेम लिए, वह समस्त विघ्न यह सह लेगा ;

कुछ इसी तरह से हो जाएगा , एक कलमकार तैयार प्रिए ।।


कभी सत्ता से टकराएगा , कभी मौज मनाता जाएगा ;

इश्क करेगा फिर टूटेगा , ज्ञान बांटता जाएगा ;

सच को सच और सच्चे को सच्चा ,

लिखने की हिम्मत किंतु वही दिखलाएगा ;

कुछ इसी तरह से एक कलमकार, अब कवि हो जाएगा ।।