बैठा हूंँ आज अपनी ही कब्र के दरबार में,

सन्नाटा है पसरा इस जहाँ के हर काल में,

ढूंढ़ रहा हूँ कुछ जानी पहचानी आवाज मैं,

पर हर कोना है उलझा इस अंधकार के जाल में।



महक रही है फूलों की सुगंध से हर दिशा,

या अल्लाह! मुझे इन फूलों की आज रज़ा बता,

जीते- जी तो कभी खिल न पाए,

पर आज मरते ही महकने की वजह बता।



लड़ रहा हूँ खुद के ही कई प्रकार से,

कोई मुझे इस प्रकार के प्रकार का पता बता,

सुलझा दूँगा इन उलझे रिश्तों की डोर मैं,

बस तू इमानदारी से इस डोर का मुझे आज पता बता।



चला जाऊँगा वापस अपनी दुनिया के छोर में 

और तोड़ दूँगा नाता जो है तेरे और मेरे काल के बीच में,

बस अगर कर दे तू वादा

अपनी रूह को देने का मुझे दान में।



    - आदित्य खटाना