जिंदगी का आलम कुछ इस तरह है,
तन मेरे और मन तेरे यहाँ है।
बुन रही हैं यादें कुछ इस तरह,
कि हम एक कमरे में तन्हा हैं।
मंजिल का शायद आज कुछ पता है,
पर ज़ालिम रस्ता कहीं गुमा है।
किस पग आऊँ तेरे दर ऐ मालिक?
शहर में आज कर्फ्यू लगा है।
- आदित्य खटाना
जिंदगी का आलम कुछ इस तरह है,
तन मेरे और मन तेरे यहाँ है।
बुन रही हैं यादें कुछ इस तरह,
कि हम एक कमरे में तन्हा हैं।
मंजिल का शायद आज कुछ पता है,
पर ज़ालिम रस्ता कहीं गुमा है।
किस पग आऊँ तेरे दर ऐ मालिक?
शहर में आज कर्फ्यू लगा है।
- आदित्य खटाना