कविता - मेरा ग़म
उसे पाने की तमन्ना में ।
हमने मन्नत मांगी थी ।।
अब ना बचा मंदिल, मस्जिद, गुरुद्वारा।
अब थक गया पाव हमरा उसे ढूढ़ते ढूढ़ते।।
अब हमें सिर्फ उसे पाने की तमन्ना थी ।
ज़िद भरी जिंदगी उसे ढूढ़ने निकल गई ।।
जो था ही नही हम उसे ढूढ़ने निकल गए।
ये कैसा इक़्श था ये कैसा प्यार है ।।
लेखक आदर्श पाण्डेय


