कविता-आँखों का गम
आज वो अपनी आँखों की नमी से
अपने दर्द और गम को शीतल किया है ।
बेवज़ह दर्द क्यों मिलते है उन आँखों को
जिसने अभी तक दुनिया नही देखा है ।
गरीबो को इतना गरीब क्यों बनाते हो
अपने अहंकारो में उन्हें क्यों झुकाते हो।
पल दो पल की भरी ये मासूम जिंदगी है।
फिर क्यों मानव से मानवता का खून करते हो।
लेखक आदर्श पाण्डेय


