शीर्षक - तुम,उम्र,शर्माहट और मैं
लम्बे अरसे के बातचीत के बाद
कुछ इच्छाएँ,कुछ अपेक्षाएँ
भारी उम्मीद के साथ मेरे भीतर
उठने के खातिर व्याकुल पड़ी थी
जिसमे उम्र का फ़ासला कुछ भी नहीं
पर शर्माहट अजीब सी है
तुम्हारे तत्त्व का हावी होना
शर्माहट को नाकामी में बदलता है
ऐसी नाकामी जहाँ शर्माहट का अस्तित्व ही न हो
तब शांत होकर चुपचाप
अपने हिस्से का न मानकर
उस ज़िन्दगी का जिसमें दोनों के होने से
एक का अस्तित्व हो
का ना होना ही जीवन का
अस्तित्व मान लेता हूँ
पर क्यों ? एक उम्मीद अभी भी
नहीं जाती की ये अपेक्षाएँ ही कभी जीवन बन जाएँ
और भय इस बात का की मृत्यु का कारण
भी तो बन सकती है
संतोष को हृदय में लेकर दिनोंदिन उबरता रहता हूँ
एक आशावाद के साथ
और एक उम्मीद के साथ भी
~ आदर्श कुमार


