तरुण प्रभात... तरुण प्रभात....
भोर किरण है नित्य बिसात।
वायु के है अपने राग।
बातों के भी अपने साथ।
राग के अपने अपने नात।
रोगो के हरकारे साथ।
छुए कोई ना दाँत पिशाच।
तरुण प्रभात....तरुण प्रभात....
हँसी ठिठोली पर इठलाए।
जब जब फेरी साथ लगाए।
पीछे से जब भी कोई आए।
तू भी चुपके से मुस्काए।
सत्ता के बातें बतियाए।
ऐसे ही तो मन बहलाए।
सब पीड़ा की एक निज़ात।
मन के हर्षित युग विश्राम।
तरुण प्रभात.... तरुण प्रभात....
पुरखो के शरणो को अवगत।
उनके मन के भीतर निर्गत।
भोर की आशा घोर अभिलाषा।
नीम जैसी है कड़वी भाषा।
फिर भी मन को जल्दी भाता।
सुनने को अब उनकी गान।
बनना होगा समय प्रधान।
पूरी दुनिया एक समाज।
तरुण प्रभात.... तरुण प्रभात....


